Sunday, 21 July 2013

बेतुकी है पंथनिरपेक्षता पर बहस

सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश अल्तमश कबीर ने पिछले दिनों भारत की बहुलतावादी संस्कृति को लेकर जो विचार व्यक्त किए, वे वस्तुत: इन दिनों सैकुलर जमात द्वारा पंथनिरपेक्षता पर चलाई जा रही बहस को सिरे से नकारते हैं। उत्तराखंड की भयावह विपदा में सुरक्षा बलों के सराहनीय योगदान पर आयोजित एक सभा को संबोधित करते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘कुछ ही देश गर्व के साथ यह कह सकते हैं कि कोई व्यक्ति जो बहुसंख्यक समुदाय का नहीं है, प्रधान न्यायाधीश बना।’’ उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा इसलिए संभव है कि मजहब अलग होने के बावजूद हमारी सोच एक समान है। हिंदू, सिख, ईसाई, मुसलमान होते हुए भी हम एक हैं। उन्होंने भारत की पंथनिरपेक्षता की प्रशंसा करते हुए इसे बनाए रखने की अपील भी की। 

विडम्बना यह है कि देश में राष्ट्रवाद पर चर्चा चलते ही उसे सांप्रदायिक ठहराने का कुत्सित प्रयास किया जाता है। मौजूदा बहस उसी मानसिकता से ग्रस्त है। पिछले दिनों विदेशी समाचार एजैंसी ‘रायटर्स’ को दिए साक्षात्कार में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो कहा, क्या उस पर कोई देशभक्त आपत्ति कर सकता है? उन्होंने कहा है, ‘‘मैं राष्ट्रवादी हूं। मैं देशभक्त हूं। जन्मना मैं हिंदू हूं, इसलिए आप कह सकते हैं कि मैं हिंदू राष्ट्रवादी हूं।’’ किंतु मोदी के मुंह से जैसे ही ये वाक्य निकले, सैकुलरिस्टों के कुनबे ने अपनी कुटिल मुहिम शुरू कर दी।

नरेंद्र मोदी को गुजरात की जनता ने लगातार तीसरी बार राज्य की कमान सौंपी है। उस जनादेश में समाज के सभी वर्गों का योगदान है। नरेंद्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता और सर्वस्वीकार्यता से सैकुलर कुनबे की घबराहट स्वाभाविक है। उपरोक्त साक्षात्कार के अंशों को इस तरह कुप्रचारित किया जा रहा है मानो मोदी, भाजपा और संघ अल्पसंख्यक विरोधीहों।

सरकारी आंकड़ों से यह स्थापित सत्य है कि सैकुलरिस्टों द्वारा शासित राज्यों के मुकाबले गुजरात में अल्पसंख्यकों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति बेहतर है। किंतु सैकुलरवाद की आड़ में अल्पसंख्यकों का भयादोहन कर सांप्रदायिकता और मजहबी कट्टरवाद को भड़काने की निरंतर कोशिशें हो रही हैं। 

तीस्ता सीतलवाड़, अरुणा राय, हर्ष मंढेर, अरुंधति राय, महेश भट्ट जैसे स्वयंभू मानवाधिकारियों के साथ-साथ कांग्रेस के सलमान खुर्शीद, दिग्विजय सिंह आदि भाजपा विरोधी मुहिम के अग्रिम नेता हैं। इनके ‘सैकुलरवाद’ की परिभाषा का खुलासा स्वयं उनका आचरण करता है। सलमान खुर्शीद जब उत्तर प्रदेश में कांगे्रस प्रभारी थे, तब वह ‘सिमी’ नामक संगठन की पुरजोर वकालत करते थे।

सलमान ही क्या, इस देश के तमाम सैकुलरिस्ट सिमी को छात्र संगठन बताकर उसके बचाव में खड़े होते थे। सिमी को आतंकी गतिविधियों में लिप्त होने के कारण प्रतिबंधित किया गया। अब वह ‘इंडियन मुजाहिद्दीन’ के नए अवतार में सभ्य समाज को रक्तरंजित करने में जुटा है, जिसका ताजा निशाना अभी बोधगया बना। एक आतंकी संगठन का बौद्धिक बचाव करने वाले सलमान खुर्शीद को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया है। क्या यही है सैकुलरवाद?

सलमान खुर्शीद ने 1986 में एक पुस्तक -‘ए होम इन इंडिया: ए स्टेटमैंट ऑफ इंडियन मुस्लिम्स’ लिखी। सिख विरोधी दंगों का उल्लेख करते हुए खुर्शीद ने लिखा है, ‘‘1984 में दिल्ली में सिखों का नरसंहार हुआ। उससे मुसलमानों को गहन आत्मसंतुष्टि हुई जो देशविभाजन के बाद की त्रासदी को भूल नहीं पाए हैं। हिंदू और सिख अपने पापों की सजा भुगत रहे हैं। 1947 में उन्होंने जो लहू बहाया, उसकी कीमत चुका रहे हैं।’’

ऐसी विषाक्त मानसिकता रखने वाले खुर्शीद ने नरेंद्र मोदी के उपरोक्त साक्षात्कार को ‘ऑक्सीमोरोन’ बताया है। अंग्रेजी का यह शब्द वैसे कथनों या भाषणों के लिए प्रयुक्त होता है, जिसमें परस्पर विरोधी बातें कही गई हों। खुर्शीद को ‘हिंदू’ और ‘राष्ट्रवाद’ विपरीतार्थक लगते हैं। क्या इनमें आपस में कोई विरोधाभास है?

देश का रक्तरंजित बंटवारा मजहब के आधार पर अलग पाकिस्तान के सृजन के लिए हुआ। बंटवारे के बाद पाकिस्तान ने खुद को इस्लामी देश घोषित कर लिया। यह बहुत स्वाभाविक होता, यदि भारत ने भी तब खुद को हिंदू राष्ट्र घोषित कर लिया होता। किंतु ऐसा हुआ नहीं। क्यों? क्योंकि भारत की सनातनी संस्कृति में बहुलतावाद और अनेकता में एकता गहरे पैबस्त है। उसी दर्शन के कारण देश में पंथनिरपेक्षता अक्षुण्ण है। पंथनिरपेक्षता कहीं से आयातित या संविधान के किसी अनुच्छेद से सृजित नहीं है। अनादि काल से भारत में बहुलतावाद पल्लवितपोषित होता रहा है। यही कारण है कि सम्राट अशोक के काल को छोड़ दें तो यहां कभी किसी मत या पंथ को राज्याश्रय नहीं मिला।

हिंदू का अर्थ किसी मत या पंथ के अनुयायी न होकर इस देश के जीवनदर्शन का नाम है। सिंधु के पार रहने वालों को सिंधु कहा गया, जो बाद में हिंदू के रूप में रूढ़ हो गया। यही हमारी राष्ट्रीयता है, इसमें संदेह कैसा? किंतु विडम्बना यह है कि जिन्होंने अलग पाकिस्तान के लिए सबसे ज्यादा पसीना बहाया, वे मुस्लिम रहनुमा विभाजन के बाद भारत में ही रह गए। रातों-रात उन्होंने कांग्रेस का हाथ थाम लिया और आज सैकुलरवाद की परिभाषा गढ़ रहे हैं। इनका सैकुलरवाद हिंदू विरोध से प्रारंभ और मजहबी कट्टरवाद के पोषण पर खत्म होता है तो आश्चर्य कैसा?

जिन महान तपस्वियों-मनीषियों ने आजाद भारत का सपना बुना, उनके लिए राष्ट्रवाद के क्या मायने थे? उन्होंने किस दर्शन को आत्मसात किया? स्वामी विवेकानंद के राष्ट्रवादी विचारों ने आजादी की लड़ाई के लिए विप्लव के बीज बोए। क्रांतिकारियों के हाथों में स्वामी विवेकानंद के साहित्य होते थे। गांधी जी ने लिखा है, ‘‘विवेकानंद को पढऩे से मेरे अंदर का राष्ट्रप्रेम सौ गुना बढ़ा है। रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा, ‘‘भारत को जानना है तो विवेकानंद को पढ़ो।’’ राजाजी, महर्षि अरविंद, सुब्रमण्यम भारती आदि सभी विवेकानंद से खासे प्रभावित थे।

उन विवेकानंद का कहना था कि भारत में राष्ट्र एक ही आध्यात्मिक धुन में झूमने वाले हृदयों का समुच्चय होना चाहिए। वह मतांतरण को हिंदू आबादी में कमी आने की जगह हिंदुओं का शत्रु बढऩा मानते थे। महर्षि अरविंद का भी मानना था कि यह हिंदू राष्ट्र सनातन धर्म के साथ उत्पन्न हुआ है और उसी के साथ बढ़ा है। सनातन धर्म के पतन से राष्ट्रवाद का भी पतन होता है। हिंद स्वराज में गांधीजी ने हिंदुत्व को भारतीय राष्ट्रवाद का मूलाधार बताया है।

सन् 1977 में 5 न्यायाधीशों की एक खंडपीठ ने भी कहा था, ‘‘हिंदुत्व किसी भी पूजा-पद्धति को स्वीकारने या नकारने की बजाय सभी मान्यताओं व पूजा- पद्धतियों को अंगीकार करता है।’’ खंडपीठ ने यह भी कहा कि हिंदुत्व एक सभ्यता और विभिन्न मजहबों का समुच्चय है, जहां कोई एक संस्थापक या पैगम्बर नहीं है। अदालत के अनुसार हिंदू इस देश में रहने वालों के लिए प्रयुक्त होता है, चाहे वे किसी भी धर्म या संप्रदाय से जुड़े क्यों न हों। यह हमारी पहचान है। सैकुलरिस्ट वोट बैंक की राजनीति के कारण समाज के एक वर्ग को उस राष्ट्रीय पहचान से वंचित रख वस्तुत: उन्हें इस देश की मुख्यधारा में शामिल होने से रोकते हैं। स्वाभाविक है कि समाज के समग्र विकास की चिंता करने वाले राष्ट्रवादी ङ्क्षचतन में ऐसे विकृत सैकुलरवाद के लिए कोई जगह नहीं है।