Tuesday, 7 May 2013

बेदाग छवि नहीं रही है पवन बंसल की

बेदाग छवि नहीं रही है पवन बंसल की

मिस्टर क्लीन प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह के एक और खास सिपाही अब भ्रष्टाचार के आरोप में फँस रहे हैं। ये सिपाही हैं, रेल मन्त्री पवन कुमार बंसल। वैसे तो बंसल 1986 में ही राज्यसभा पहुँच गये थे और उसके बाद संसदीय जीवन की एक लम्बी पारी खेली है। लेकिन उनका वास्तविक राजनीतिक अभ्युदय मनमोहन सिंह के समय में हुआ। पहली बार वो यूपीए-1 में मनमोहन सिंह के कारण वित्त राज्य मन्त्री बने। दोबारा मनमोहन की सरकार बनी तो कैबिनेट रैंक में आये और संसदीय कार्यमन्त्री बन गये। जब ममता की पार्टी रेल मन्त्रालय से निकली तो उनकी लाटरी खुली और रेल मन्त्री बन गये। मनमोहन सिंह को खासी उम्मीद थी पवन बंसल से। एक तो बंसल विरोध की राजनीति नहीं करते। सामने वालों के लिये यसमैन रहते हैं। सरकार जो कहेगी वही करेंगे। रेल मन्त्रालय में यही किया। फिर मनमोहन सिंह को पवन बंसल के ज्ञान पर भी भरोसा रहा है। बंसल बिना बात के विवादों में नही पड़ते और यही काऱण है कि दिल्ली में स्वच्छ छवि बनाने में वे अभी तक कामयाब रहे थे।
लेकिन 3 मई 2013 की शाम उनके लिये खराब था। भ्रष्टाचार के आरोप में पवन बंसल बुरी तरह से घिर गये। उनके भांजे को 90 लाख रुपये का रिश्वत लेते सीबीआई ने गिऱफ्तार किया। वैसे चंडीगढ़ में इस बात की आम चर्चा थी कि अगर रेलवे में कोई काम हो तो विजय सिंगला से मिलो, पैसे दो और काम करवा लो। क्योंकि पवन बंसल के लिये सारा कामकाज वही देखते हैं। दरअसल रेल मन्त्री बनते ही पवन बंसल के रिश्तेदारों के यहाँ रेलवे के काम के लिये भीड़ लगने लगी थी। जिस दिन पवन बंसल को रेल मन्त्री बनाने का फैसला लिया गया था उस दिन चंडीगढ़ में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में पवन बंसल थे। जैसे ही उन्हें फोन से सूचना दी गयी उनके आसपास के समर्थक एक दूसरे को बधाई दे रहे थे। बधाई देने का कारण सिर्फ यह था कि सूखे संसदीय कार्य मन्त्रालय से उनका तबादला हरियाली वाले रेल मन्त्रालय में हो गया था। बेशक नई दिल्ली में पवन बंसल की गिनती ईमानदार मन्त्रियों में हो रही थी। लेकिन चंडीगढ़ में उनकी इमेज ईमानदार की कभी नहीं रही। उनके विरोधी उनके भांजे विजय सिंगला और उनके कुछ और रिश्तेदारों पर रेल मन्त्रालय में काम करवाने के एवज में डीलिंग करने का आरोप लगाते रहे।
विजय सिंगला इस समय सीबीआई की हिरासत में है। रेलवे बोर्ड के मेम्बर से काम के एवज में 90 लाख रुपये ले रहे थे। हालाँकि पवन बंसल ने इस मामले से पल्ला झाड़ लिया है। लेकिन देश की जनता बंसल की इस सफाई पर शायद ही भरोसा करे। अगर सीबीआई विजय सिंगला के पिछले पाँच छःह सालों में शुरू किये गये कई प्रोजेक्टों की भी जाँच करेगी तो पवन बंसल की मुश्किलें बढ़ जायेंगी क्योंकि विजय सिंगला ने चंडीगढ़ और इसके आसपास के लगते इलाकों में भारी सम्पत्ति अर्जित की है। शहर के सबसे महँगे इण्डस्ट्रियल एरिया में उनके प्लॉट हैं। ये प्लॉट पिछले कुछ सालों में ही खरीदे गये हैं। विजय सिंगला इण्डस्ट्रियल एरिया में ही  एक बड़ा मॉल बना रहे हैं। बीते साल ही इस मॉल में निर्माण कार्य के दौरान मलबा में दबकर मजदूरों की मौत हो गयी थी। लेकिन प्रशासन ने विजय सिंगला के दबदबे देख कोई कार्रवाई नहीं की थी। बंसल के तमाम विरोधियों का आरोप यही है कि विजय सिंगला के इस मॉल की ही सीबीआई जाँच करेगी तो पवन बंसल की मुश्किलें बढ़ जायेंगी। बंसल के खिलाफ लगातार चुनाव लड़ने वाले चंद्रशेखर सरकार में मन्त्री रहे हरमोहन धवन के अनुसार उन्होंने राजनीति में अपनी सम्पत्ति गँवायी लेकिन पवन बंसल की सम्पत्ति हर चुनाव के बाद बढ़ती गयी। धवन के अनुसार विजय सिंगला की सम्पत्तियों की ईमानदारी से अगर सीबीआई जाँच करवायेगी तो पवन बंसल के सारे निवेश का पता चल जायेगा। धवन आरोप लगाते है कि विजय सिंगला ने हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़, पंजाब और हरियाणा में अरबों रुपए की सम्पत्ति बनायी जो वास्तव में पवन बंसल की है।
सवाल यह है कि विजय सिंगला की गिरफ्तारी और घूस लिये जाने के मामले से पवन बंसल कैसे बच सकते हैं? घूस रेलवे के एक अधिकारी महेश कुमार ने भिजवायी। महेश कुमार पश्चिम रेलवे के जनरल मैनेजर भी रह चुके हैं। वे छोटे मोटे अधिकारी नहीं है। फिलहाल वो मेम्बर रेलवे बोर्ड हैं। आखिर रेलवे बोर्ड का एक मेम्बर पवन बंसल के भांजे को घूस क्यों देगा? समाज सेवा के लिये या मन्दिर में दान देने के लिये? अगर ये पैसे मन्दिर में दान और समाज सेवा के लिये नहीं थे फिर किसी काम के एवज में दिये गये। फिर उस अधिकारी का काम या उसके फाइलों पर दस्तखत विजय सिंगला को नहीं बल्कि पवन बंसल को ही करना है। तो निश्चित तौर पर इस पूरे रिश्वत प्रकरण की जानकारी पवन बंसल को रही होगी। इसलिये इस पूरे घूस काण्ड से पवन बंसल लाख सफाई के बावजूद बेदाग नहीं बच सकते है।
रेल मन्त्रालय में पिछले दिनों कुछ अहम परिवर्तन देखने को मिले थे। पत्रकारों का प्रवेश रेल मन्त्रालय में बन्द कर दिया गया था। रेल मन्त्रालय के कामकाज की पारदर्शिता खत्म हो गयी थी। कई लोगों ने साफ तौर पर कहा कि पत्रकारों का प्रवेश इसलिये बन्द किया गयी क्योंकि मन्त्रालय के अन्दर खुलेआम डीलिंग हो रही थी। कई लोगों ने साफ तौर पर आरोप लगाया कि पैसेंजर कमेटी के सदस्य बनने के लिये भी पैसे माँगे जा रहे है। राजनीतिक पदों पर नियुक्ति के लिये भी पैसे माँगे जा रहे है।
पवन बंसल का भरोसा अपने खास लोगों पर ही हमेशा रहा। वो भी रिश्तेदारों पर ही। यहाँ तक कि उनके पर्सनल स्टाफ में वही अधिकारी रखे गये जो कहीं न कहीं से उनकी रिश्तेदारी में हैं। चंडीगढ़ में कांग्रेस के ही लोग साफ कह रहे हैं कि पवन बंसल कई मामलों में पार्टी की सुनते ही नहीं थे। यहाँ तक कि टिकट कन्फर्मेशन के लिये भी कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं की सुनवायी नहीं थी। जबकि विरोधी दलों का तर्क है कि उनके निजी स्टाफ की गतिविधियों को सीबीआई जाँच करे तो सारा खेल पता चल जायेगा।
आम चर्चा है कि रेल मन्त्री बनने के बाद पवन बंसल का व्यवहार एरोगेन्ट था। चंडीगढ़ में विरोधियों को धमका कर कांग्रेस में शामिल करवाया जा रहा था। पहले विरोधियों पर सरकारी अमलों से कारर्वाई करवायी जाती थी फिर उन्हें बुलाकर कहा जाता था कि कांग्रेस ज्वाइन कर लो, मामला रफा दफा हो जायेगा। चंडीगढ़ के गाँव दड़ुआ में भाजपा समर्थक दो-तीन होटल मालिक अपने होटल गिराये जाने के डर से ही कांग्रेस में शामिल हो गये। जबकि कुछ भाजपा समर्थक गोदाम मालिकों ने जब कांग्रेस में शामिल होने से इन्कार किया तो उनके गोदामों को प्रशासन से गिरवा दिया गया। चंडीगढ़ मार्केट कमेटी के चेयरमैन पर पहले प्रशासन ने छापा डाला और उस पर जुर्माना लगाया गया। चेयरमैन भाजपा समर्थक थे। मामला समझ गये। कांग्रेस में शामिल हो गये और ईश्वरीय कृपा से उनके खिलाफ चल रही सारी कार्रवाई रुक गयी।
यह पहला अवसर नहीं है कि बंसल विवादित हुये हैं। ये उनकी खुशकिस्मती रही कि उनका विवाद राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खी नहीं बना। चंडीगढ़ की स्थानीय मीडिया तक ही उनका विवाद सीमित रह गया। यूँ तो उनका विवादों से वास्ता राजग सरकार के समय से ही था। उस समय चंडीगढ़ में अपने दिल्ली पब्लिक स्कूल के लिये जमीन आवंटन को लेकर बंसल विवाद में आ गये थे। हालाँकि उस समय सरकार भाजपा की थी और स्थानीय भाजपा नेता इस पर हंगामा करते रहे। लेकिन बताया जाता है कि बंसल को मदद उस समय राजग सरकार में मन्त्री रही सुषमा स्वराज से मिल गयी। संप्रग-1 के समय में चंडीगढ़ के पूर्व प्रशासक और पंजाब के गर्वनर एसएफ रोड्रिग्स से उनका विवाद सड़क पर आ गया था। बंसल का आरोप था कि रोड्रिग्स उनकी सुनते नहीं हैं। जबकि रोड्रिग्स ने साफ आरोप लगाया था कि बंसल अपने निजी फायदों के लिये उनसे काम करवाना चाहते हैं। रोड्रिग्स के समय में ही चंडीगढ़ के डिप्टी कमिशनर रहे अरूण कुमार से बंसल की सीधी टक्कर हो गयी थी। अरूण कुमार ने साफ कहा था कि पवन बंसल उनसे गलत काम करवाना चाहते थे। बंसल, अरूण कुमार से इतने नाराज हुये कि दो साल में ही उन्हें वापस उनके पैरेंट कैडर हरियाणा में भिजवा दिया। हालाँकि अरुण कुमार भी डरे नहीं और मीडिया में बंसल के खिलाफ मोर्चा खोलकर बैठ गये थे।
हाल ही में पवन बंसल का नाम चंडीगढ में बूथ घोटाले में उछला था। चंडीगढ़ के तत्कालीन एडीसी पीएस शेरगिल ने शहर में करोड़ों रुपये के हुये बूथ घोटाले की जाँच की थी। जाँच रिपोर्ट में एडीसी ने पवन बंसल पर अँगुली उठायी। एडीसी ने रिपोर्ट में बताया था कि इस बूथ घोटाले में करोड़ों रुपये का खेल हुआ है। इसके बाद पवन बंसल एडीसी से खासे नाराज हो गये थे। लेकिन बंसल का विवादों से सिर्फ यहीं लेना देना नहीं है। चंडीगढ़ में नगर निगम ने जेपी ग्रुप को एक प्लॉट आवंटित किया था। इस प्लाट आवंटन के खिलाफ कांग्रेस के ही एक पार्षद चंद्रमुखी शर्मा मोर्चा खोल बैठे थे। उन्होंने इस सम्बंध में सीवीसी तक शिकायत की। इस भूमि आवंटन में भी पवन बंसल पर अंगुली उठायी गयी थी। बंसल वो नेता है जो कांग्रेस के बराबर भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में पैठ रखते हैं। संघ के एक जाति विशेष के स्थानीय पदाधिकारी जो पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में हैं, बंसल के मुरीद हैं। बंसल को हमेशा उनसे मदद मिलती रही। इसके अलावा बंसल के सम्बंध सुषमा स्वराज समेत कई भाजपा नेताओं से अच्छे रहे। चंडीगढ़ में इस बात की आम चर्चा होती है कि बंसल के चुनाव में जितने कांग्रेसी उनके समर्थन में सक्रिय होते हैं उतने ही संघ और भाजपा के कार्यकर्ता उनके समर्थन में सक्रिय होते हैं। यही कारण है कि लगातार 1999 से बंसल चुनाव बंसल जीत रहे हैं।
पर एक अहम सवाल है कि आखिर सीबीआई ने एक कांग्रेसी मन्त्री पर हमला कैसे कर दिया ? क्या सीबीआई वाकई में स्वतन्त्र हो गयी है? क्योंकि पवन बंसल कोई कमजोर शख्स नहीं है। इसका जवाब काफी आसान है। इस समय सीबीआई चीफ रंजीत सिन्हा मुश्किल में हैं। कोलगेट घोटाले और चारा घोटाले में सीबीआई की हाल में हुयी कार्रवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई पर सवालिया निशान लगा दिया है। रंजीत सिन्हा ने इस सवालिया निशान का काट ढूँढ लिया। अब सुप्रीम कोर्ट में अगली पेशी में रंजीत सिन्हा यह बताने में सक्षम होंगे कि सीबीआई सरकारी दबाव में नहीं है। अगर सीबीआई सरकारी दबाव में होती तो बंसल के भांजे को गिरफ्तार नहीं किया जाता ? इतने ब़ड़े घूस काण्ड को सीबीआई एक्सपोज नहीं करती ?